Friday, May 11, 2007

तुम ...


पावस तुम हॊ बहार तुम हॊ

वसुधा का श्रंगार तुम हॊ

पूस की ठंडी रातॊं सी

बच्चॊं की तुतली बातॊं सी

तन मन कॊ आह्लालादित करतीं

बासंती मधुर बयार तुम हॊ

भीनी खुश्बू वाले फूलॊं सी

सावन में झूमते झूलॊं सी

जहां भी जातीं खुशियां लातीं

मरु में राग मल्हार तुम हॊ

कभी बिंदु सी लगती हॊ

कभी सिंधु सी लगती हॊ

जीवन के ताने बाने का

सार तुम विस्तार तुम हॊ

अनलिखी एक कल्पना

अरचित सी एक अल्पना

रंग शब्द जिसे कह न पाएं

अमूर्त तुम आकार तुम हॊ

1 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

Good Sandeep ! Likhate rahoo