
छंटे अंधेरा फूटे पौ
प्रकट हो प्रभात
भोर की मद्धम हवा चले
झूम उठें सब डाली पात
धूप की चादर उजियारी
लेकर किरणों की सौगात
बड़े मान से सूरज आए
रथ में जोड़े घोड़े सात
सांझ जब ढलने को आए
महक उठे नैनों में रात
चंदा आकर उकड़ू बैठे
जैसे नानी रही हो चरखा कात
है रोज रोज ही होता ये
फिर भी नित नई लगती बात
कुदरत का ये खेल है ऐसा
जिसमें नहीं कोई शह और मात