Wednesday, May 6, 2009

भोर











छंटे अंधेरा फूटे पौ

प्रकट हो प्रभात

भोर की मद्धम हवा चले

झूम उठें सब डाली पात


धूप की चादर उजियारी

लेकर किरणों की सौगात

बड़े मान से सूरज आए

रथ में जोड़े घोड़े सात

सांझ जब ढलने को आए

महक उठे नैनों में रात

चंदा आकर उकड़ू बैठे

जैसे नानी रही हो चरखा कात

है रोज रोज ही होता ये

फिर भी नित नई लगती बात

कुदरत का ये खेल है ऐसा

जिसमें नहीं कोई शह और मात

2 comments:

daanish said...

aisaa achhaa kaavya
maaloom nahi
kaise un-padhaa reh gayaa !?1

waah !!

Sandeep Agrawal said...

thx daanish