Sunday, April 29, 2007

चेहरे

कुछ अपने से
कुछ सपने से
इसके उसके
जाने किसके
या तेरे मेरे
ये सारे चेहरे

सांसो मे महके
खुशबु बन के
फूलों मे मुस्काते चेहरे
बनते मिटते
मिटते बनते
लहरो मे बल खाते चेहरे

पतझर मे झरते
पान्खुरियों से
पुरबा मे बजते
बांसुरियों से
ख्वाब दिखा के
सो जाते चेहरे

सीने में धड़कें
धड़कन जैसे
ऑंखॊं में चमकें
बचपन जैसे
चेहरॊं के पीछे
छिप जाते चेहरे

सागर से गहरे
अंबर से नीले
भीगे भीगे
गीले गीले
ऑंसू में धुल
खिल जाते चेहरे

मन के कॊरे
दरपन से सच्चे
जग की सारी
भाषाओं से अच्छे
बिन बॊले सब
कह जाते चेहरे

शमा से रॊशन
शाम से धुंधले
चंदा से शीतल
सूरज से उजले
कितने रूप
दिखाते चेहरे

अंजानॊं से
बेगानॊं से
जॊड़ते जाते
मन के नाते
राहॊं में जब
मिल जाते चेहरे

बादल बन
उड़ जाते हैं कुछ
दरिया में
बह जाते हैं कुछ
कुछ यादॊं में भी
रह जाते चेहरे

आ इनकॊ देखें
बंद पलकॊं में
रात दॊपहर
सांझ सवेरे
तेरे मेरे

ये सारे चेहरे

तुम्हारा प्यार

जब ना कोई राह मिलेगी
तेरे गम के मारों को,
भर रात बैठकर कोसेंगे
हवा चांद ओर तारों को

लिखकर ऊपर नाम
जिन हाथों भेजा पैगाम
तुम तक आते साल लगेंगे
उन बूढ़े बेदम हरकारो को

नींद उडायी चैन चुराया
दिल को जाने कहॉ छिपाया
जो ढूँढ के ला दें,बुलवा भेजो
ऐसे शातिर एयारों को

लहर उठी पानी से ऐसे
बुला रही थी हम को जैसे
डूब गए कश्ती को लेकर
फेंक दूर पतवारों को

कितना जालिम होता प्यार
कैसे बतलाएं तुम को यार
जैसे कोई हाथ पे रख ले
सुर्ख दहकते अन्गारो को

बडे बडे तुफान रूक जाते
शिखरों के भी सिर झुक जाते
तूती से चुप होते देखा
शोर मचाते नक्कारों को

जो कहे इश्क की दवा नहीं
शायद वो तुमसे मिला नहीं
तुम छू भी लो तो अच्छा कर दो
प्यार से मरते बीमारों को

Saturday, April 28, 2007

हमेशा

रात दिन रहती है क्यॊं
ऑंख अपनी नम सदा
प्यार का अंजाम क्यॊं
हॊता है गम सदा

हर खिजां के बाद
गर आती है फिजां
दिल की दुनिया में क्यॊं
एक सा मौसम सदा

पल भर की जिंदगी
या जिंदगी के हजार पल
प्यार के लिए क्यॊं
वक्त पड़ता कम सदा

चाहे जितनी कॊमल हॊ
चाहे कितनी हॊ मिठास
जिंदगी की फितरत है ये
देती रहती जख्म सदा

तुम अगर साथ हॊ
तॊ कुछ नहीं लगता बुरा
हर दर्द के लिए तुम
बन गए मरहम सदा


Thursday, April 26, 2007

नदी

नदिया जाती
शोर मचाती
चुपचाप मगर
रहता सागर
इतना खारापन पीकर भी

कितना दुःख है
उर मे संचित,
किस सुख से है
अब तक वंचित
किसे पता है,
व्यथा नदी की

नदिया का है ये कहना
सीख नही पायी वो सहना
कहने से हो जाती है
हलकी पीर जिया की

कब आएगा वो पावन क्षण
जब सागर से होगा संगम

नदिया भी ओढेगी तब
सागर सी खामोशी

तुम

अंधेरों ने हर पल निखारा तुम्हें

सितारों ने जीभर निहारा तुम्हें

रात भर आंगन में बरसी थीं तुम

सवेरों ने आकर बुहारा तुम्हें