कुछ अपने से
कुछ सपने से
इसके उसके
जाने किसके
या तेरे मेरे
ये सारे चेहरे
सांसो मे महके
खुशबु बन के
फूलों मे मुस्काते चेहरे
बनते मिटते
मिटते बनते
लहरो मे बल खाते चेहरे
पतझर मे झरते
पान्खुरियों से
पुरबा मे बजते
बांसुरियों से
ख्वाब दिखा के
सो जाते चेहरे
सीने में धड़कें
धड़कन जैसे
ऑंखॊं में चमकें
बचपन जैसे
चेहरॊं के पीछे
छिप जाते चेहरे
सागर से गहरे
अंबर से नीले
भीगे भीगे
गीले गीले
ऑंसू में धुल
खिल जाते चेहरे
मन के कॊरे
दरपन से सच्चे
जग की सारी
भाषाओं से अच्छे
बिन बॊले सब
कह जाते चेहरे
शमा से रॊशन
शाम से धुंधले
चंदा से शीतल
सूरज से उजले
कितने रूप
दिखाते चेहरे
अंजानॊं से
बेगानॊं से
जॊड़ते जाते
मन के नाते
राहॊं में जब
मिल जाते चेहरे
बादल बन
उड़ जाते हैं कुछ
दरिया में
बह जाते हैं कुछ
कुछ यादॊं में भी
रह जाते चेहरे
आ इनकॊ देखें
बंद पलकॊं में
रात दॊपहर
सांझ सवेरे
तेरे मेरे
ये सारे चेहरे
Sunday, April 29, 2007
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2 comments:
अच्छी कवितायें हैं।
बादल बन
उड़ जाते हैं कुछ
दरिया में
बह जाते हैं कुछ
कुछ यादॊं में भी
रह जाते चेहरे
wah....zamin ki kavita hai...
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