Thursday, April 26, 2007

नदी

नदिया जाती
शोर मचाती
चुपचाप मगर
रहता सागर
इतना खारापन पीकर भी

कितना दुःख है
उर मे संचित,
किस सुख से है
अब तक वंचित
किसे पता है,
व्यथा नदी की

नदिया का है ये कहना
सीख नही पायी वो सहना
कहने से हो जाती है
हलकी पीर जिया की

कब आएगा वो पावन क्षण
जब सागर से होगा संगम

नदिया भी ओढेगी तब
सागर सी खामोशी

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