नदिया जाती
शोर मचाती
चुपचाप मगर
रहता सागर
इतना खारापन पीकर भी
कितना दुःख है
उर मे संचित,
किस सुख से है
अब तक वंचित
किसे पता है,
व्यथा नदी की
नदिया का है ये कहना
सीख नही पायी वो सहना
कहने से हो जाती है
हलकी पीर जिया की
कब आएगा वो पावन क्षण
जब सागर से होगा संगम
नदिया भी ओढेगी तब
सागर सी खामोशी
Thursday, April 26, 2007
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